जब एक नियोक्ता किसी चालक को नियुक्त करता है, तो उसे यह ध्यान रखना होगा कि उसका कर्मचारी समय के भीतर अपने लाइसेंस को नवीनीकृत करवाए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि अगर चालक ने अपने लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं कराया, तो बीमा कर्मचारी को तब तक उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि मालिक ये साबित नहीं कर दे कि उसने ड्राइविंग लाइसेंस की जांच की या उसे निर्देश दिए थे कि ड्राइवर अपने ड्राइविंग लाइसेंस को समाप्ति की तिथि पर नवीनीकृत करवाए।
इस मामले में, राजिंदर कुमार को बेली राम द्वारा एक ड्राइवर के रूप में रखा गया था। राजिंदर के साथएक दुर्घटना हुई, जब वो बेली राम का ट्रक चला रहा था। उसने कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत एक याचिका दायर की। आयुक्त ने एक अवार्ड पारित किया जिसमें बीमा कंपनी को 94,464/ - रुपये चोटों के लिए और 6,3,313/ - रुपये चिकित्सा व्यय के लिए का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।इसका ब्याज नियोक्ता द्वारा भुगतान करने के लिए निर्देशित किया गया था। अपील में, उच्च न्यायालय ने बीमा कंपनी के किसी भी दायित्व से इनकार कर दिया था, क्योंकि बीमाकर्ता का ड्राइविंग लाइसेंस संबंधित समय में समाप्त हो गया था।
"हमारा विचार है कि एक बार ड्राइविंग लाइसेंस को सत्यापित करने की मूल देखभाल नियोक्ता द्वारा लेनी होगी, हालांकि एक विस्तृत जांच आवश्यक नहीं हो सकती है, वाहन के मालिक को लाइसेंस में ही पता चल जाएगा कि ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता क्या है। यह नहीं कहा जा सकता है कि इसके बाद वह यह जांचने की ज़िम्मेदारी से हाथ धो सकता है कि ड्राइवर ने लाइसेंस को नवीनीकृत नहीं किया है। यह ऐसा मामला नहीं है जहां लाइसेंस को कुछ समय के लिए नवीनीकृत नहीं किया गया है जैसे की एक महीने के लिए, जैसा कि स्वर्ण सिंह के मामले में माना गया था, जहां बीमा कंपनी को बोझ देकर तीसरे पक्ष को लाभ दिया गया था। तत्काल मामले में लाइसेंस का नवीनीकरण तीन साल की अवधि के लिए नहीं किया गया है और वह भी ट्रक की तरह वाणिज्यिक वाहन के संबंध में। अपीलकर्ता ने उसको सत्यापित करने में घोर लापरवाही दिखाई।"
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