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मंगलवार, 10 मार्च 2026

ब्लड रिलेशन में गिफ्ट डीड (Gift Deed) की मुख्य बातें

 ब्लड रिलेशन (रक्त संबंध) (माता-पिता, बच्चे, पति-पत्नी, भाई-बहन) में गिफ्ट डीड एक कानूनी दस्तावेज है, जिसके द्वारा संपत्ति बिना पैसे के ट्रांसफर की जाती है। इस पर बहुत कम स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्री शुल्क लगता है और यह उपहार के रूप में प्राप्त करने पर आयकर से मुक्त है, जिसे सब-रजिस्ट्रार के पास रजिस्टर कराना अनिवार्य है।

ब्लड रिलेशन में गिफ्ट डीड (Gift Deed) की मुख्य बातें:
  • रक्त संबंध का दायरा: माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे (बेटा-बेटी), भाई-बहन, दादा-दादी, पोता-पोती, ससुर-बहू, और दत्तक बच्चों को इसमें शामिल किया जाता है।
  • स्टाम्प ड्यूटी और फीस: ब्लड रिलेशन में प्रॉपर्टी गिफ्ट करने पर स्टाम्प ड्यूटी काफी कम होती है। कई राज्यों में यह एक फिक्स मामूली राशि (जैसे ₹1,000-₹5,000) या प्रॉपर्टी वैल्यू का सिर्फ 1% हो सकता है
  • रजिस्ट्रेशन अनिवार्य: गिफ्ट डीड को रजिस्टर करना अनिवार्य है। इसके लिए दो गवाहों की आवश्यकता होती है।
  • रद्द करने की प्रक्रिया: यदि गिफ्ट डीड में शर्त के अनुसार ट्रांसफर नहीं हुआ है या धोखाधड़ी हुई है, तो इसे अदालत में चुनौती देकर रद्द किया जा सकता है, अन्यथा यह स्वैच्छिक और स्थायी होता है।
  • आयकर (Income Tax): निकट संबंधियों से प्राप्त उपहार पर कोई आयकर (Income Tax) नहीं लगता है।
  • प्रक्रिया: एक वकील के माध्यम से डीड तैयार करें, स्टाम्प ड्यूटी भरें, और सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में गवाहों के साथ जाकर पंजीकरण कराएं। 
नोट: स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्री शुल्क हर राज्य में अलग-अलग हो सकते हैं।

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

राजपत्र (Gazette) की मुख्य बातें:

 राजपत्र (Gazette of India) भारत सरकार का आधिकारिक प्रकाशन और कानूनी दस्तावेज है, जिसमें सरकार अपने आधिकारिक फैसलों, नए नियमों, कानूनों, अधिनियमों, और राजपत्रित अधिकारियों (Gazetted Officers) की नियुक्तियों को प्रकाशित करती है। यह सरकार द्वारा आम जनता को सूचित करने का एक आधिकारिक माध्यम है, जो न्यायालयों में प्रमाण के रूप में मान्य होता है।

राजपत्र (Gazette) की मुख्य बातें:
  • आधिकारिक प्रकाशन: यह केंद्र या राज्य सरकार द्वारा जारी की जाने वाली आधिकारिक सूचना है, जिसे "भारत का राजपत्र" या "Gazette of India" कहा जाता है।
  • सामग्री: इसमें सरकारी नीतियों, नियमों में परिवर्तन, नियुक्तियां, तबादले, और सार्वजनिक सूचनाएं शामिल होती हैं।
  • कानूनी मान्यता:
     राजपत्र में प्रकाशित कोई भी जानकारी कानूनी दस्तावेज मानी जाती है
  • उपयोग: इसका उपयोग नाम बदलने (Name Change), धर्म बदलने, जन्म-मृत्यु के रिकॉर्ड, और सरकारी नियुक्तियों के सत्यापन के लिए किया जाता है।
  • प्रकार: ये साप्ताहिक रूप से या असाधारण मामलों (Extraordinary Gazette) में प्रकाशित होते हैं।
उदाहरण: जब किसी व्यक्ति को अपना नाम या सरनेम आधिकारिक तौर पर बदलना होता है, तो वह राजपत्र अधिसूचना (Gazette Notification) के माध्यम से ही किया जाता है।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

पैन फॉर्म 60 क्या है?

 भारत सरकार ने आय कमाने वाले समूहों और वित्तीय ट्रांजेक्शन करने वाले नागरिकों के लिए पैन कार्ड आनिवार्य कर दिया है। पैन कार्ड को सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ में से एक माना जाता है जिसका लाभ वित्तीय ट्रांजेक्शन, पहचान प्रमाण, टैक्स रिटर्न भरने आदि के लिए लिया जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति या कंपनी के पास पैन नहीं है, तो उन्हें ट्रांजेक्शन  का लाभ उठाने  के लिए  संबंधित प्राधिकरण को पैन फॉर्म 60 जमा करना होगा।

भारत का आयकर विभाग टैक्स चोरी या संस्थाओं द्वारा की गई किसी भी धोखाधड़ी गतिविधियों से बचने के लिए वित्तीय ट्रांजेक्शन
को ट्रैक करने के लिए पैन का उपयोग करता है। हालांकि, पैन कार्ड होना ज़रूरी है लेकिन, कुछ ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं, जहां व्यक्ति पैन कार्ड रखने में विफल हो जाते हैं। इसके लिए ट्रांजेक्शन को आगे बढ़ाने के लिए अन्य दस्तावेज़ों के साथ फॉर्म 60 जमा किया जा सकता है।

पैन फॉर्म 60 क्या है?

यह एक आधिकारिक दस्तावेज़ है जो उन व्यक्तियों द्वारा पेश किया जाता है जिनके पास वित्तीय ट्रांजेक्शन या बैंक अकाउंट
खोलने केलिए पैन कार्ड नहीं है। फॉर्म 60 का उपयोग प्रॉपर्टी को खरीदने और बेचने,50,000 रु. से अधिक के नगद भुगतान
पर, टैक्स रिटर्न दाखिल करना , व्यवसाय का रजिस्ट्रेशन और अन्य के लिए किया जाता है। इस मामले में, यदि आपके पास
पैन कार्ड नहीं है, तो वित्तीय ट्रांजेक्शन के लिए फॉर्म 60 एक दस्तावेज़ होना चाहिए।

फॉर्म 60 की अनिवार्यता

फॉर्म 60 की आवश्यकता तब होती है जब किसी व्यक्ति के पास पैन कार्ड नहीं है और नीचे दी गयीं वित्तीय ट्रांजेक्शन करना चाहता है:

  • अचल प्रॉपर्टी को खरीदने या बेचने पर, जिसकी कीमत 5 लाख रु. या इससे अधिक है
  • किसी भी मोटर वाहन को खरीद या बेचने पर (टू-व्हीलर वाहनों को छोड़कर)
  • किसी भी बैंक में 50,000 रु. या इससे अधिक का फिक्स्ड डिपॉज़िट अकाउंट खोलना
  • सेविंग बैंक अकाउंट में 50,000 रु. या इससे अधिक जमा करने के लिए
  • कोई भी कॉन्ट्रैक्ट जिसकी कीमत 10 लाख रु. या इससे अधिक हो और सिक्योरिटिज़ को खरीदने और बेचने के लिए
  • किसी भी वित्तीय संस्थान या बैंक में अकाउंट खोलने के लिए
  • मोबाइल फोन समेत टेलीफोन कनेक्शन के लिए आवेदन करने के लिए
  • होटल या रेस्टोरेंट में 25,000 रु. या इससे अधिक के बिलों का भुगतान करने के लिए

ऊपर दिए गए वित्तीय ट्रांजेक्शन आम तौर पर व्यक्तियों / कंपनी द्वारा किए जाते हैं, जिसके लिए उन्हें पैन कार्ड की न होने पर फॉर्म 60 की आवश्यकता होती है।

फॉर्म 60 के लिए आवश्यक दस्तावेज़

फॉर्म 60 जमा करने से पहले व्यक्तियों को फॉर्म 60 के साथ-साथ पहचान या प्रमाण पते के प्रमाण  प्रदान  करने के लिए नीचे  दिए गए कुछ दस्तावेज़ों को पेश करना चाहिए। कुछ दस्तावेज़ों में शामिल हैं:

(A) ड्राइविंग लाइसेंस

(B) पासपोर्ट

(C) राशन कार्ड

(D) एक मान्यता प्राप्त संस्थान से पहचान प्रमाण

(E) बिजली बिल या टेलीफोन बिल की कॉपी

( F)  फॉर्म में उल्लिखित पते से जुड़ा कोई भी प्रमाण

फॉर्म 60 भरने की प्रक्रिया

पैन कार्ड के बजाय फॉर्म 60 के साथ आगे बढ़ने का फैसला लेने से पहले सभी जानकारियों को जानना महत्वपूर्ण है।फॉर्म भरने और  जमा करने से पहले नीचे दी गई सभी बातों को ध्यान में रखें और निम्नलिखित जानकारी उसमें भरें:

  • आवेदक का पूरा नाम और पता
  • आवदेक की जन्मतिथी और पिता का नाम(व्यक्तिगत के मामले में)
  • मोबाइल नंबर के साथ आवेदक का पूरा पता
  • ट्रांजेक्शन की जानकारीऔर ट्रांजेक्शन राशि
  • यदिआपने टैक्स का आकलन किया है, तो अपनी जानकारी, रेंज, वार्ड या सर्कल का उल्लेख करें जहां आपने अंतिम बार इनकम टैक्स दर्ज किया था
  • आधारनंबर भरें, अगर आपके पास है तो
  • अगर आपने पैन के लिए आवेदन किया है और पैन नहीं मिला है तो आवेदन की तारीख और रसीद नंबर दें

फॉर्म भरते समय ध्यान रखें कि उसमें किसी भी तरह की कोई गलती या ओवरराइटिंग न हो।

फॉर्म 60 कैसे जमा करें?

फॉर्म 60 जमा करने में ऐसी कोई बड़ी बात नहीं है।फॉर्म में सभी जानकारियों को ध्यान से भरने  के बाद  कोई भी वित्तीय  ट्रांजेक्शन  करने से पहले इसे आसानी से संबंधित प्राधिकरण को सौंपा जा सकता है। यह ट्रांजेक्शन करने पर लाभ और प्रमाण को सुनिश्चित  करेगा।

संबंधित सवाल

प्रश्न. कब तक मुझे पैन / फॉर्म 60 जमा करना है?
उत्तर: आपको बैंक खाता खोलते समय आदर्श रूप से पैन / फॉर्म 60 जमा करना चाहिए।

प्रश्न. अगर मैं अपना पैन / फॉर्म 60 अपडेट नहीं करता तो क्या होगा?
उत्तर: यदि आपका पैन / फॉर्म 60 अपडेट नहीं है, तो आप 50,000 रुपये से अधिक का ट्रांजेक्शन नहीं कर पाएंगे। 

भारत में पैन कार्ड कार्यालय अन्य पैन कार्ड फॉर्म
दिल्ली में पैन कार्ड केंद्रफॉर्म 61
गुड़गांव में पैन कार्ड केंद्रफॉर्म 49 ए
मुंबई में पैन कार्ड केंद्रफॉर्म 49AA
नोएडा में पैन कार्ड केंद्रफॉर्म 60
बैंगलोर में पैन कार्ड केंद्र
चेन्नई में पैन कार्ड केंद्र
कोलकाता में पैन कार्ड केंद्र
पुणे में पैन कार्ड केंद्र
हैदराबाद में पैन कार्ड केंद्र
वडोदरा में पैन कार्ड केंद्र

रविवार, 27 सितंबर 2020

[ वाहन दुर्घटना मुआवजा] बीमा कंपनी उत्तरदायी नहीं, जब तक कि मालिक ये साबित ना कर दे कि उसने ड्राइवर के लाइसेंस की जांच की या उसे समय पर नवीनीकृत करवाने को कहा था : सुप्रीम कोर्ट

जब एक नियोक्ता किसी चालक को नियुक्त करता है, तो उसे यह ध्यान रखना होगा कि उसका कर्मचारी समय के भीतर अपने लाइसेंस को नवीनीकृत करवाए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि अगर चालक ने अपने लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं कराया, तो बीमा कर्मचारी को तब तक उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि मालिक ये साबित नहीं कर दे कि उसने ड्राइविंग लाइसेंस की जांच की या उसे निर्देश दिए थे कि ड्राइवर अपने ड्राइविंग लाइसेंस को समाप्ति की तिथि पर नवीनीकृत करवाए।


इस मामले में, राजिंदर कुमार को बेली राम द्वारा एक ड्राइवर के रूप में रखा गया था। राजिंदर के साथएक दुर्घटना हुई, जब वो बेली राम का ट्रक चला रहा था। उसने कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत एक याचिका दायर की। आयुक्त ने एक अवार्ड पारित किया जिसमें बीमा कंपनी को 94,464/ - रुपये चोटों के लिए और 6,3,313/ - रुपये चिकित्सा व्यय के लिए का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।इसका ब्याज नियोक्ता द्वारा भुगतान करने के लिए निर्देशित किया गया था। अपील में, उच्च न्यायालय ने बीमा कंपनी के किसी भी दायित्व से इनकार कर दिया था, क्योंकि बीमाकर्ता का ड्राइविंग लाइसेंस संबंधित समय में समाप्त हो गया था।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचार किए गए कानून का सवाल यह था कि क्या वैध ड्राइविंग लाइसेंस के मामले में, यदि लाइसेंस की अवधि समाप्त हो गई है, तो बीमित व्यक्ति अपनी देयता से बच सकता है? अदालत ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां एक लाइसेंस का नवीनीकरण कम अवधि के लिए नहीं किया गया है, जैसे एक महीने के लिए, जैसा कि स्वर्ण सिंह के मामले में माना गया था, जहां बीमा कंपनी पर बोझ डालकर तीसरे पक्ष को लाभ दिया गया था। पीठ ने इस प्रकार कहा :

"हमारा विचार है कि एक बार ड्राइविंग लाइसेंस को सत्यापित करने की मूल देखभाल नियोक्ता द्वारा लेनी होगी, हालांकि एक विस्तृत जांच आवश्यक नहीं हो सकती है, वाहन के मालिक को लाइसेंस में ही पता चल जाएगा कि ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता क्या है। यह नहीं कहा जा सकता है कि इसके बाद वह यह जांचने की ज़िम्मेदारी से हाथ धो सकता है कि ड्राइवर ने लाइसेंस को नवीनीकृत नहीं किया है। यह ऐसा मामला नहीं है जहां लाइसेंस को कुछ समय के लिए नवीनीकृत नहीं किया गया है जैसे की एक महीने के लिए, जैसा कि स्वर्ण सिंह के मामले में माना गया था, जहां बीमा कंपनी को बोझ देकर तीसरे पक्ष को लाभ दिया गया था। तत्काल मामले में लाइसेंस का नवीनीकरण तीन साल की अवधि के लिए नहीं किया गया है और वह भी ट्रक की तरह वाणिज्यिक वाहन के संबंध में। अपीलकर्ता ने उसको सत्यापित करने में घोर लापरवाही दिखाई।"


 जब एक नियोक्ता किसी चालक को नियुक्त करता है, तो उसे यह ध्यान रखना होगा कि उसका कर्मचारी समय के भीतर अपने लाइसेंस को नवीनीकृत करवाए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि अगर चालक ने अपने लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं कराया, तो बीमा कर्मचारी को तब तक उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि मालिक ये साबित नहीं कर दे कि उसने ड्राइविंग लाइसेंस की जांच की या उसे निर्देश दिए थे कि ड्राइवर अपने ड्राइविंग लाइसेंस को समाप्ति की तिथि पर नवीनीकृत करवाए।

 Also Read - [एयरफेयर रिफंड] SC ने COVID-19 लॉकडाउन के दौरान बुकिंग करने वाले फ्लाइट टिकट के रिफंड की मांग करने वाली याचिका पर आदेश सुरक्षित रखा इस मामले में, राजिंदर कुमार को बेली राम द्वारा एक ड्राइवर के रूप में रखा गया था। राजिंदर के साथएक दुर्घटना हुई, जब वो बेली राम का ट्रक चला रहा था। उसने कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत एक याचिका दायर की। आयुक्त ने एक अवार्ड पारित किया जिसमें बीमा कंपनी को 94,464/ - रुपये चोटों के लिए और 6,3,313/ - रुपये चिकित्सा व्यय के लिए का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।इसका ब्याज नियोक्ता द्वारा भुगतान करने के लिए निर्देशित किया गया था। अपील में, उच्च न्यायालय ने बीमा कंपनी के किसी भी दायित्व से इनकार कर दिया था, क्योंकि बीमाकर्ता का ड्राइविंग लाइसेंस संबंधित समय में समाप्त हो गया था। 

Also Read - सुप्रीम कोर्ट ने धर्म के आधार पर COVID-19 का डेटा या सूचना के खिलाफ दाखिल याचिका खारिज की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचार किए गए कानून का सवाल यह था कि क्या वैध ड्राइविंग लाइसेंस के मामले में, यदि लाइसेंस की अवधि समाप्त हो गई है, तो बीमित व्यक्ति अपनी देयता से बच सकता है? अदालत ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां एक लाइसेंस का नवीनीकरण कम अवधि के लिए नहीं किया गया है, जैसे एक महीने के लिए, जैसा कि स्वर्ण सिंह के मामले में माना गया था, जहां बीमा कंपनी पर बोझ डालकर तीसरे पक्ष को लाभ दिया गया था। पीठ ने इस प्रकार कहा : 

Also Read - [झूठा घोषणा पत्र] सुप्रीम कोर्ट ने उसे गुमराह करने के लिए गोरखपुर की सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी किया "हमारा विचार है कि एक बार ड्राइविंग लाइसेंस को सत्यापित करने की मूल देखभाल नियोक्ता द्वारा लेनी होगी, हालांकि एक विस्तृत जांच आवश्यक नहीं हो सकती है, वाहन के मालिक को लाइसेंस में ही पता चल जाएगा कि ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता क्या है। यह नहीं कहा जा सकता है कि इसके बाद वह यह जांचने की ज़िम्मेदारी से हाथ धो सकता है कि ड्राइवर ने लाइसेंस को नवीनीकृत नहीं किया है। यह ऐसा मामला नहीं है जहां लाइसेंस को कुछ समय के लिए नवीनीकृत नहीं किया गया है जैसे की एक महीने के लिए, जैसा कि स्वर्ण सिंह के मामले में माना गया था, जहां बीमा कंपनी को बोझ देकर तीसरे पक्ष को लाभ दिया गया था। तत्काल मामले में लाइसेंस का नवीनीकरण तीन साल की अवधि के लिए नहीं किया गया है और वह भी ट्रक की तरह वाणिज्यिक वाहन के संबंध में। अपीलकर्ता ने उसको सत्यापित करने में घोर लापरवाही दिखाई।" 

Also Read - [आईपीसी की धारा 120 बी] असम्बद्ध तथ्यों या अलग-अलग स्थानों तथा समयों पर किये गये आचार-व्यवहार के तार्किक लिंक के बिना साजिश की बात नहीं मानी जा सकती:... उसके बाद पीठ ने टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम आकांक्षा व अन्य में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम मनोज कुमार व अन्य में इलाहाबाद हाईकोर्ट और हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम हेम राज में की गई टिप्पणियों का उल्लेख किया। पीठ ने विशेष रूप से हेम राज में की गई टिप्पणियों का हवाला दिया: "18. जब एक नियोक्ता किसी चालक को नियुक्त करता है, तो यह जांचना उसका कर्तव्य है कि चालक को वाहन चलाने के लिए विधिवत लाइसेंस प्राप्त है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा- 5 में कहा गया है कि मोटर वाहन का प्रभारी कोई भी मालिक या व्यक्ति मोटर वाहन अधिनियम की धारा 3 और 4 की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करने पर किसी भी व्यक्ति को वाहन चलाने की अनुमति देगा या नहीं देगा। मालिक को यह दिखाना होगा कि उसने लाइसेंस सत्यापित कर लिया है। उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि उसका कर्मचारी समय के भीतर अपने लाइसेंस का नवीनीकरण करवा ले। मेरी राय में, मालिक के पास यह दलील देने के लिए कोई बचाव नहीं है कि वह भूल गया कि उसके कर्मचारी के ड्राइविंग लाइसेंस को नवीनीकृत किया जाना था। एक व्यक्ति जब वह अपने मोटर वाहन को एक चालक को सौंपता है, तो बड़े पैमाने पर समाज के लिए कुछ जिम्मेदारी होती है। निर्दोष लोगों की जान जोखिम में डालकर वाहन को ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया जाता है जो विधिवत लाइसेंस नहीं लेता है। इसलिए, यह दिखाने के लिए कुछ सबूत होना चाहिए कि मालिक ने या तो ड्राइविंग लाइसेंस की जांच की थी या अपने ड्राइवर को निर्देश दिया था कि वह अपने ड्राइविंग लाइसेंस को समाप्ति की तारीख पर नवीनीकृत करवाए। वर्तमान मामले में, ऐसे किसी भी सबूत को पेश नहीं किया गया है। उपरोक्त चर्चा के मद्देनज़र, मैं स्पष्ट रूप से यह देख रहा हूं कि पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन था और दावे को पूरा करने के लिए बीमा कंपनी को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता था।" उपरोक्त टिप्पणियों का ध्यान रखते हुए, बेंच ने कहा: "हमने उपर्युक्त टिप्पणियों को फिर से प्रस्तुत किया है क्योंकि हमारा विचार है कि यह स्पष्ट रूप से सही कानूनी स्थिति निर्धारित करता है और हम तीन अलग-अलग उच्च न्यायालयों के तीनों निर्णयों में दिए गए विचारों के साथ पूर्ण सहमति में हैं, जो कि हेम राज मामले में फैसले में सही कानूनी सिद्धांत है।" पीठ ने आखिरकार अपील खारिज कर दी।

Thank you 




शनिवार, 29 अगस्त 2020

(छात्र बनाम UGC) छात्र बिना परीक्षा के पास नहीं किए जा सकते, लेकिन राज्य परीक्षा टालने के लिए UGC से संपर्क कर सकते हैं : सुप्रीम कोर्ट 

 सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के निर्देश को चुनौती देते हुए याचिकाओं का निस्तारण करते हुए 30 सितंबर तक अंतिम वर्ष की परीक्षाओं को करने के लिए आगे आदेश जारी किए हैं।

1. पीठ ने परीक्षा आयोजित करने के लिए यूजीसी के दिशानिर्देशों को रद्द करने की प्रार्थना से इनकार कर दिया है। 

2. विशेष राज्यों में परीक्षा रद्द करने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निर्देश यूजीसी के निर्देशों पर लागू होंगे।


 3. हालांकि पिछले प्रदर्शन के आधार पर छात्रों को पास करने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का निर्देश आपदा प्रबंधन अधिनियम के दायरे से बाहर है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यूजीसी के आदेश के अनुसार राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों में परीक्षा के बिना अंतिम वर्ष के छात्रों को बढ़ावा नहीं दे सकते हैं। राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों को COVID19 महामारी की स्थिति में परीक्षा स्थगित करने के लिए यूजीसी से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी गई है।


3. महामारी और लॉकडाउन ने कक्षाओं को बाधित कर दिया है, और अपेक्षित संख्या के बिना परीक्षा आयोजित करना मनमाना और अनुचित है। 

4. अंतिम सेमेस्टर के कई छात्र हैं जिन्होंने या तो नौकरी के लिए साक्षात्कार को मंजूरी दे दी है या उच्च पाठ्यक्रमों के लिए सुरक्षित प्रवेश लिया है। इसलिए पिछले प्रदर्शन के आधार पर उन्हें जल्द से जल्द डिग्री प्रमाणपत्र प्रदान करना छात्रों के भविष्य की सुरक्षा के लिए सबसे अच्छा पाठ्यक्रम है।


 5. ऑनलाइन परीक्षा का विकल्प सभी के लिए इंटरनेट तक समान पहुंच की कमी को देखते हुए व्यवहार्य नहीं है। 

6. केवल परीक्षा ही मूल्यांकन का तरीका नहीं है। यूजीसी पहले दिन से छात्र के 'सतत मूल्यांकन' की अवधारणा का अनुसरण करता है। इसलिए, पिछले सेमेस्टर के आंतरिक मूल्यांकन और प्रदर्शन को अंतिम डिग्री देने के लिए माना जा सकता है। वहीं यूजीसी ने कहा था कि यह निर्देश छात्रों के सर्वोत्तम हित में जारी किया गया था। गृह मंत्रालय ने अदालत को बताया कि उसने परीक्षा आयोजित करने के उद्देश्य से शिक्षण संस्थान खोलने की छूट दी है। आपदा प्रबंधन अधिनियम बनाम UGC अधिनियम इस मामले ने आपदा प्रबंधन अधिनियम और यूजीसी अधिनियम के बीच संघर्ष के मुद्दे को भी जन्म दिया। 

यह महाराष्ट्र राज्य राज्य के संदर्भ में हुआ जब राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निर्णय में अंतिम कार्यकाल परीक्षा रद्द करने का निर्देश दिया गया था। इसलिए, इस मुद्दे के रूप में एक मुद्दा उत्पन्न हुआ कि किसके निर्देश लागू होंगे - SDMA का या यूजीसी का। यूजीसी ने कहा कि उच्च शिक्षा से संबंधित मामलों में, उसका अंतिम फैसला है और एसडीएमए उस डोमेन में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र राज्य ने प्रस्तुत किया कि COVID ​​-19 महामारी की पृष्ठभूमि में, जिसे डीएमए के अर्थ के भीतर एक 'आपदा' के रूप में अधिसूचित किया गया है, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को लोगों के जीवन की रक्षा के लिए स्थिति के निपटने के लिए उचित निर्णय लेने के लिए विशाल शक्तियां प्राप्त हैं। राज्य की स्वायत्तता इस मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह था कि क्या राज्य सरकारों के पास इस मामले में स्वायत्तता है। दिल्ली, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र आदि के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकारों ने अंतिम परीक्षा रद्द करने के निर्देश जारी किए हैं। इसलिए, सवाल यह था कि क्या यूजीसी उस संबंध में राज्य सरकारों को ओवरराइड कर सकता है। 


राज्य सरकारों द्वारा यह तर्क दिया गया था कि यूजीसी के पास केवल मानक या शिक्षा देने की शक्ति है और विश्वविद्यालयों को दिशा-निर्देश जारी नहीं कर सकता है। आगे यह तर्क दिया गया कि यूजीसी केवल दिशानिर्देश दे सकता है, वह भी यूजीसी अधिनियम की धारा 12 के अनुसार विश्वविद्यालयों से विमर्श करने के बाद। राज्यों ने तर्क दिया कि यूजीसी ने उनसे परामर्श किए बिना और स्थानीय स्थितियों का ध्यान रखे बिना निर्णय लिया। वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ एएम सिंघवी (याचिकाकर्ता यश दुबे के लिए), श्याम दीवान (याचिकाकर्ता युवा सेना के लिए), अरविंद पी दातार (महाराष्ट्र के लिए), केवी विश्वनाथन (दिल्ली के लिए), जयदीप गुप्ता (पश्चिम बंगाल के लिए), वकील अलख आलोक श्रीवास्तव (अन्य याचिकाकर्ताओं के लिए), सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (यूजीसी के लिए) आदि ने मामले में तर्क दिए।